मंदिर वही बनाएंगे… राम मंदिर का संघर्ष – १ : प्रकट हुए राम और …

राम मंदिर का संघर्ष – १

अयोध्या की राम जन्मभूमि (Ram janambhoomi) दुनिया भर के करोड़ों हिन्दुओं की अस्मिता का विषय हैं। करोड़ों रामभक्तों की आस्था अयोध्या(Ayodya) के साथ जुडी हैं। ५ अगस्त को अयोध्या में राम जन्मभूमि स्थल पर राम मंदिर का भूमिपूजन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (PM Modi) के हस्ते होगा। राम जन्मभूमि की छाती पर बना बाबरी ढाँचा हिन्दुओं के इस्लामिक गुलामी की निशानी है। यह निशानी मिटाकर वहाँ भव्य मंदिर बनाने के लिए लाखों रामभक्तोंने संघर्ष किया; कईयोने प्राणों की आहुति दी, पुलिस की लाठियाँ खाई, जेल गए। इन सबका बलिदान और त्याग सफल होने का दिन करीब आने के अवसर पर यह सिंहावलोकन। रामजन्मभूमि और उसके लिए हुए संघर्ष का भी। …

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२ दिसंबर १९४७ को एक चमत्कार हुआ। अयोध्या में राम जन्मभूमि की सुरक्षा के लिए तैनात एक सिपाई को मध्य रात्रि के बाद, राम जन्मभूमि स्थल में रोशनी चमकती दिखी। उस रौशनी में उसे शिशु – रूप राम दिखाई दिए। सैकड़ों भक्त भी शिशु स्वरूप राम का दर्शन कर रहे हैं, ऐसा उसे साक्षात्कार हुआ। उस दिन से रामभक्तों ने राम चबूतरे पर अखंड कीर्तन प्रारंभ किया जो ६ दिसंबर १९९२ एक चलता रहा। ६ दिसंबर को बाबरी ढाँचा ढ़हने के बाद वह जगह सरकारने अपने अधिकार में ली इस कारण अखंड कीर्तन का स्थान बदला गया। अखंड कीर्तन आज भी जारी हैं।

अयोध्या में साक्षात प्रभु राम (Lord Ram) प्रकट हुए यह समाचार हवा की तरह चारों ओर फैल गया। इसकी प्रतिक्रिया मुस्लिम समाज में होगी; इसका विरोध होगा, यह संभावना ध्यान में रखकर २९ दिसंबर १९४७ को तत्कालीन जिल्हाधिकारी कृष्णकुमार नायर ने वह स्थल विवादित घोषित कर वहाँ ‘जमावबंदी’ का आदेश लागू किया। केवल ४ पुजारी और एक भंडारी को वहाँ जाने की अनुमति थीं। फैजाबाद के तत्कालीन नगराध्यक्ष के. के. राम वर्मा को रिसिव्हर नियुक्त किया। विवादित स्थल से ५०० मीटर की सीमा में मुसलमानों के लिए प्रवेश बंद किया गया।

राम मंदिर आंदोलन में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरपुर में हुए विराट हिन्दू संमेलन (Virat hindu sammelan) का उल्लेख करना ही होगा। उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मंत्री दाऊदयाल खन्ना उस संमेलन में उपस्थित थें। वे काँग्रेस जेष्ठ नेता थें। मुरादाबाद से ५ बार विधायक चुने गए थें। अयोध्या की राम जन्मभूमि, मथुरा में की श्रीकृष्ण जन्मभूमि और कशी विश्वनाथ मंदिर स्थल पर बनी मस्जिद हिन्दू स्वाभिमान को आव्हान हैं; यह बात उन्होंने पूरी ताकत के साथ उठाई।

वहाँ उपस्थित जनसमुदाय को यह जानकारी नहीं थीं। उसी सम्मेलन में राम जन्मभूमि आंदोलन का बीजारोपण हुआ। उल्लेखित तीनों हिन्दू धार्मिक स्थल मुक्त करने का संकल्प इस सम्मेलन में किया गया। धर्म संसद के बाद विश्व हिंदू परिषद का एक शिष्टमंडल, दाऊदयाल खन्ना ने दी जानकारी के आधार पर सत्यशोधन के लिए तीनो स्थलों पर गया। उस शिष्टमंडल का नेतृत्व अशोक सिंघल जी ने किया था। बाद में अशोक जी राम जन्मभूमि आंदोलन के नेता बन गए। अप्रेल १९८४ में दिल्ली के विज्ञान भवन में एक राष्ट्रीय संमेलन हुआ। वह पहली धर्म संसद थी।

उस धर्म संसद में हिन्दुओं के श्रद्धा के तीनों स्थल मुक्त करने का प्रस्ताव अविरोध पारित किया गया। ‘श्रीरामजन्मभूमी मुक्ती यज्ञ समिति’ की स्थापना की गई। अयोध्या में राम जन्मभूमि को लगा ताला खोलने के लिए बिहार के सीतामढी से ‘श्रीराम-जानकी रथयात्रा’ प्रारंभ करने का महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया गया। नियोजित समयानुसार रथयात्रा निकली। लेकिन यात्रा दिल्ली पहुँचने से पहले, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। उसके बाद दिल्ली और देश में सिक्खों का हत्याकांड आरंभ हुआ। इस कारण समिति ने आंदोलन एक वर्ष के लिए रोक दिया। ऑक्टोबर १९८५ में कर्नाटक के उडिपी में दूसरी धर्म संसद हुई; उसमें सरकार को ‘राम जन्मभूमि का ताला खोलो’ यह इशारा दिया गया।

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