राम मंदिर का संघर्ष भाग – ३ : सौगंध राम की खाते हैं…

सौगंध राम की खाते हैं…

राम भक्तों में प्रचंड उत्साह निर्माण हुआ था। ‘सौगंध राम की खाते हैं… हम मंदिर वही बनाएंगे’ यह निर्धार दिल्ली से गली तक व्यक्त हो रहा था। वही, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायमसिंह यादव ने घोषित किया कि ३० ऑक्टोबर को अयोध्या में कारसेवा नही होने देंगे।

अयोध्या की ओर जानेवाले सब रास्ते बंद कर दिये गए। रेल गाड़ियाँ भी रद्द की गई। श्री राम जन्मभूमि को पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने घेर लिया। मुलायमसिंह ने अहंकार में दावा किया कि, ‘हमारी इजाजत के बिना अयोध्या में कारसेवक तो क्या, परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा।’ करीब १ लाख ८० हजार जवान तैनात किए गए। उत्तर प्रदेश से सटे मध्य प्रदेश, राजस्थान से जुड़नेवाले रास्तों में कई स्थानों पर १० फिट गहरे गड्ढे खोद कर रास्ते बंद किये गए। इटावा में चंबल नदी के पुल पर सिमेंट की १० फिट ऊँची और ३ फिट चौड़ी दीवार बनाई गई । कई स्थानों पर लोहे के रेलिंग लगाकर उसमें बिजली का करंट छोड़ा गया।

राम मंदिर आंदोलन का समाचार पूरी दुनिया में फैल गया था। वृत्त संकलन के लिए देश – विदेश से पत्रकार आये थें । मुलायमसिंह सरकार का इतना तगड़ा बंदोबस्त देखकर मिडिया भी सोच रही थी कि, अयोध्या में चींटी भी नहीं घुस सकती।

अशोक जी सिंघल ने अज्ञात स्थान से घोषणा की कि, ३० ऑक्टोबर १९९० को दोपहर १२. ३० बजे कारसेवा होगी। किसी को इस पर विश्वास नहीं हो रहा था। देवोत्थान एकादशी को अयोध्या में कर्फ्यू था। सुरक्षा बलों को ‘देखते ही गोली मारने’ का आदेश दिया गया था। रास्तों पर सशस्त्र जवानों के आलावा कोई दिखाई नहीं दे रहा था।

सुबह ९ बजे अचानक मणिरामदास छावनी के दरवाजे खुले। पूज्य वामदेवजी और महंत नृत्यगोपाल दास बाहेर निकले । उसी समय वाल्मिकी मंदिर का दरवाजा खुला और विश्व हिंदू परिषद के महामंत्री अशोक सिंघल प्रकट हुए। उनके साथ थें उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व पुलिस महानिरिक्षक श्रीशचंद्र दीक्षित। उन्हें देखकर सब आश्चर्य चकित रह गए। इन लोगों को ढूंढने के लिए पुलीस और सुरक्षा जवानों ने अयोध्या का चप्पा – चप्पा छान मारा था!

पत्रकारों को आश्चर्य हुआ। उन्होनें सोचा ये दो – चार नेता राम जन्म भूमि स्थल पर जाकर क्या करेंगे ? इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था के सामने क्या टिकेंगे ? लेकिन, चमत्कार तो आगे हुआ। इन नेताओ ने ‘जय श्री राम’ की घोषणा देते ही घरों में से बाल – वृद्ध, महिला बाहर निकलने लगे। चंद मिनटों में भगवे दुपट्टे बांधे हजारों स्त्री – पुरुषों का समूह आगे बढ़ने लगा। सबसे आगे थे संत। उनके पीछे थी महिलाएँ, फिर बालक और सबसे अंत में पुरुष। सब निहत्थे लेकिन निडर। सब रामभक्त ‘जय श्रीराम’ की घोषणा दे रहे थें। प्रशासन हक्का-बक्का था। ‘परिंदा भी पैर नही मार सकता’ का दंभ भरनेवालों के होश उड़ गए थे।

हजारों कारसेवक हनुमान गढ़ी के करीब पहुँचे। पुलिस ने उनपर लाठी हमला किया। अशोक जी सिंघल के मस्तक पर लाठी लगी। खून की धार बहने लगी। उसी समय भूतपर्व आयपीएस अधिकारी श्रीशचंद्र दीक्षित (६४) ने विवादित ढाँचे की आठ फीट ऊँची दीवार लाँघी और जाकर रामलल्ला के सामने खड़े हो गए। इस पर किसी को विश्वास नहीं हो रहा था। सैकड़ो कारसेवक मैदान में जमा हो गए। कोलकाता से आए रामकुमार आणि शरद इन कोठारी बंधुओं ने मस्जिद के गुंबद पर चढ़कर तिरंगा फहराया। रामभक्तों ने जल्लोष किया।

अयोध्या मेँ घटित घटनाएँ, विवादित ढाँचे पर राम भक्तों ने किया कब्जा, इससे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायमसिंह यादव बहुत अस्वस्थ हुए। शहीद कारसेवकों के अंत्यसंस्कार के लिए ३१ आॅक्टोबर और १ नवंबर को कारसेवा बंद रखी गई। २ नवंबर को राम दर्शन कर पुनः कारसेवा आरंभ करने की घोषणा हुई। अयोध्या में प्रचंड उत्साह का वातावरण था। मानो दिवाली मनाई जा रही हो। किसे पता था कि कुछ ही समय बाद होली खेली जाएगी; और वह भी खून की। २ नवंबर को कुछ अघटित होना था।

रामलल्ला का दर्शन कर कारसेवक लौटने ही वाले थें। सुबह ११ बजे दिगंबरी अखाड़े के परमहंस रामचंद्र दास, मणिराम छावनी के महंत नृत्यगोपाल दास, शरयू नदी के किनारे से बजरंग दल के संयोजक विनय कटियार, श्रंगारहाट से उमा भारती के नेतृत्व में कारसेवकों के जत्थे राम जन्म भूमि की बढ़ रहें थें। मुख्यमंत्री मुलायम सिंह अपमान की आग में जल रहें थें। विनय कटियार और उमा भारती के नेतृत्व में चल रहे निहत्थे कार सेवकों पर बेछूट लाठी हमला किया गया। परमहंस रामचंद्र दास के नेतृत्व में जा रहें कार सेवकों के पीछे आँसू गॅस के गोले फोड़े गए और गोलियाँ चलाई गई। कार सेवक ‘जय श्री राम’ की घोषणा देते हुए छाती पर गोलियाँ झेल रहे थें। ३० आॅक्टोबर को बाबरी ढाँचे के गुंबद पर तिरंगा फहरानेवाले शरद कोठारी को पुलिस ने कार सेवकों की भीड़ में से खींचकर बाहर निकला। उस पर गोलियाँ बरसाई। शरद के बचाव में उनका भाई राम कुमार सामने आया; उसे भी गोलियों से भून दिया। दोनों शहीद हो गए। कोठारी परिवार के ये दो ही बच्चे थें।

अयोध्या की कारसेवा रक्तरंजित होने के से देशभर में क्रोध भर गया। अयोध्या में बलिदान देनेवालों के अस्थिकलश लोगों के दर्शन के लिए देश भर में भेजे गए। हजारों – लाखों लोगों ने अस्थिकलश का दर्शन किया। १९९१ में मकर संक्रांति को इन अस्थिकलशों का विसर्जन प्रयागराज के संगम में किया गया।

कार सेवकों के बलिदान ने राम मंदिर निर्माण का संकल्प और भी दृढ कर दिया। २ और ३ अप्रेल को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में चौथी धर्म संसद आयोजित की गई। साथ ही ४ अप्रेल को बोट क्लब पर २५ लाख रामभक्तों की उपस्थिति में रैली हुई। संतों ने ‘मंदिर वही बनाएगें’ का संकल्प व्यक्त किया। संतों ने दृढतापूर्वक कहा – सरकार को राम भक्तों के इस सागर के सामने झुकना ही पडेगा। रैली चल ही रह थी की समाचार आया, मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दिया। इससे पहले १७ सितंबर को केंद्र में की राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार विश्वासमत हार चुकी थीं। कार सेवकों का – ‘दिल्ली की गद्दी डुबो सके, सरयू में इतना पानी है’, नारा सच साबित हुआ।

फिर लहराया भगवा

३१ आॅक्टोबर १९९१ को पुनः कार सेवक अयोध्या में बड़ी संख्या में इकट्ठा हुए। राम जन्म भूमि समिति ने प्रतीकात्मक कारसेवा करने का निर्णय लिया था। कुछ उत्साही कार सेवक फिर ढाँचे के गुंबद पर चढ़े वहाँ भगवा फहराया। गुंबद की कुछ तोड – फोड हुई। उत्तर प्रदेश सरकार ने तुरंत उसको ठीक कर दिया और चारों ओर दीवारे खड़ी कर दी।

आंदोलन के नेता स्वामी वामदेव, परमहंस रामचन्द्र दास, महंत अवैद्य नाथ, युगपुरुष परमानंद, स्वामी चिन्मयानंद ने दिल्ली में प्रधानमंत्री नरसिंह राव से भेट की। ९ जुलाई १९९२ से अयोध्या में साठ दिन का ‘सर्वदेव अनुष्ठान’ आरंभ किया गया।

राम मंदिर की नीव डालने का काम शुरु किया गया। शांति से चल रहे इस काम के कारण कथित धर्मनिरपेक्षवादी नेता अस्वस्थ थें। संसद के दोनों सदनों में आंदोलन की गूंज सुनाई दी। संसद एक सप्ताह ठप रही। प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने राम मंदिर आंदोलन के नेताओं से तीन माह का समय माँगा। विश्वास दिलाया; इस अवधि में अयोध्या विवाद पर हल खोजा जाएगा।संतो ने प्रधानमंत्री के वचन का आदर करते हुए राम मंदिर की नीव बनाने का काम रोक दिया।

(क्रमशः)

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