हिंदुत्व की राजनीति करनेवाली शिवसेना, हिंदुत्व के मुद्दों पर ही फँसेगी

shivsena-thackeray-hindutva

शिवसेना की राजनीती भावनाओं पर चलती है। शिवसेना कभी हिंदुत्व का दमन थामती है तो कभी हिन्दुओं की भावनाओं से खेलती है। इसके लिए शिवसेना के पास भगवा (केसरिया), जय भवानी – जय शिवाजी जैसे ब्रँड हैं। इसमें शिवसेनाप्रमुख बाळासाहेब ठाकरे का हिंदुत्व शिवसेना के काम आता है। हिंदुत्व से शिवसेना अचानक मराठी की और झुकती है, फिर उसे ‘मराठी माणूस’ की चिंता होने लगती है। शिवसेना को लगता है कि मुंबई के टुकड़े किए जा रहे हैं। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं होता है। मुंबई के टुकड़े करने की कतई सम्भावना नहीं रहती। लेकिन अकारण शिवसेना ऐसा दिखावा करती है कि मुंबई तोड़ने का कारस्थान रचा जा रहा है। शिवसेना गरजती है – मुंबई को महाराष्ट्र से तोड़नेवालों याद रखों शिवसेना तुम्हारी छाती पर चढ़ जाएगी ! मुंबई के मराठी लोगों को या भाषा बहुत पसंद आती है, उन्हें लगता हैं की केवल शिवसेनाही हमारी तारणहार है।

यही शिवसेना मराठी लोगों को कभी गुजरातियों तो कभी दक्षिण भारतीयों के बारे में सतर्क करती रहती है। अब शिवसेना की इस भावनिक राजनीति पर निश्चित ही मर्यादा आएगी जो भविष्य में उसके लिए खतरा साबित होगी। दो सियासी पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने के बाद शिवसेना हिंदुत्व के मुद्दे पर पहले के समान प्रभावी राजनीति नहीं कर पाएगी। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने विधानसभा में घोषित किया है कि शिवसेना कभी भी हिंदुत्व से दूर नहीं जाएगी लेकिन, जनता जानती है कि केवल बातें करने से कुछ नहीं होता।

काँग्रेस और राष्ट्रवादी जैसी पार्टियों के साथ जाकर और धर्मनिरपेक्षता शब्द न्यूनतम समान कार्यक्रम में स्वीकार कर शिवसेना ने अपने हिंदुत्व की धार कम कर दी है। हिंदुत्व नहीं छोड़ेंगे ऐसा ठाकरे कितना भी कहें; लेकिन उनकी उक्ति एवं कृति में फर्क आ गया है। इस कारण हिन्दू मतों पर शिवसेना का पहले जैसा प्रभाव नहीं पडेगा. अनेक भावनिक मुद्दे ऐसे हैं जिनपर शिवसेना अपनी रोटियाँ सेकती रही हैं। उनमे से एक है मुस्लिमों को आरक्षण। इस आरक्षण का शिवसेना पहले से विरोध करती रही है। लेकिन अब मुस्लिम वोटबॅंक जिनका आधार है ऐसे काँग्रेस और राष्ट्रवादी पार्टियों की मदद से सरकार चलाते समय मुस्लिम आरक्षण के मुद्दे पर शिवसेना पहले के समान तीव्र विरोध की भूमिका नहीं ले पाएगी।

कोरेगाव – भीमा हिंसाचार मामले में दर्ज अपराध रद्द करने की माँग काँग्रेस और राष्ट्रवादी के नेता कर रहे हैं। उनमें दलितों का पक्ष प्रभावी रूप से प्रस्तुत कर राजनीति करनेवाले नेता जितेन्द्र आव्हाड भी है। पहले की सरकार ने यह अपराध रद्द करने का आदेश दिया था उसपर क्या करवाई हुई है यह पहले देखेंगे, ऐसा बहाना बनाकर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरेने अभी तो बात टाल दी है। कोरेगाव – भीमा हिंसाचार का स्वरूप हिन्दू विरुद्ध दलित और मुख्यतः मराठा विरुद्ध दलित था। उसमें अधिकांश अपराध दलितों के विरुद्ध दर्ज हैं; और वह हिंसा से संबंधी हैं इसलिए वह रद्द नहीं होने चाहिए ऐसी मराठा समाज की भावना है। इस स्थिति में यह अपराध रद्द करना मुख्यमंत्री ठाकरे और शिवसेना के लिए टेढ़ीखीर साबित होगा।

कट्टर हिंदुत्ववादी संघठन ‘सनातन’ पर प्रतिबंध लगाओ, ऐसी माँग काँग्रेस और राष्ट्रवादी के नेता कर रहे हैं। भाजपा और शिवसेना हिंदुत्ववादी हैं। फडणवीस सरकार ने गत ५ वर्ष में सनातन पर प्रतिबंध लगाने की बात टाली। अब काँग्रेस और राष्ट्रवादी के धर्मनिरपेक्ष या कट्टर हिंदुत्वविरोधी नेताओं की माँग के अनुसार उद्धव ठाकरे ने सनातन पर प्रतिबंध लगाया तो शिवसेना के हिंदुत्व पर प्रश्नचिन्ह निर्माण होगा। सगयोगी पार्टियों के दबाव के सामने झुके या कट्टर हिंदुत्व का दामन थामे रहें यह प्रश्न केवल सनातन ही नहीं कई और मुद्दों पर भी शिवसेना के लिए मुश्किलें खड़ा करेगा।

दिग्विजय सिंग और काँग्रेस के अन्य नेताओं ने स्वातंत्र्यवीर वि. दा. सावरकर की स्वाधीनता संग्राम में की भूमिका और गाँधी हत्त्या मामले के मुकदमे के संदर्भ में सदैव प्रश्न निर्माण किए हैं। वही सावरकर को ‘भारत रत्न’ दिया जाय यह शिवसेना की माँग रही है। काँग्रेस-राष्ट्रवादी के साथ मिलकर सरकार चलते समय शिवसेना इस भूमिका पर कैसे कायम रहती हैं यह भी प्रश्न है। हम कट्टर हिंदुत्व नहीं छोड़ेंगे, हमारा भगवा रंग किसी भी लॉन्ड्री में धुलकर फीका नहीं पड़ेगा ऐसा कहना और उसी समय हिंदुत्व से दूर होते जाने से शिवसेना का हिंदुत्व से विरोधाभास बढ़ते जाएगा।