मंदिर वही बनाएंगे… राममंदिर का संघर्ष – २ : सत्ता बदली, राममंदिर का जोष बढा

Ayodhya Ram Mandir

अयोध्या की राम जन्मभूमि का ताला खोलो ऐसा आदेश फैजाबाद के जिला न्यायाधीश ने १ जनवरी १९८६ को दिया। उस समय केन्द्र में काँग्रेस (Congress) की सरकार थी। राजीव गांधी प्रधानमंत्री थें और काँग्रेस के ही वीरबहादूर सिंह (Veerbhadur Singh) उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थें।

दूसरी और राम मंदिर (Ram Mandir) कैसा बनेगा इसकी चर्चा धर्म संसद ने आरंभ कर दी थी। सोमनाथ मंदिर के वास्तुशास्त्री श्री. सोमपुरा के पौत्र और मंदिर के विख्यात शिल्पकार चंद्रकांत सोमपुरा (Chandrakant Sompura) को यह दायित्व सौंपा गया। उन्होंने इसका प्रारूप तैयार किया।

जनवरी १९८९ में प्रयाग के कुम्भ मेले में आयोजित तृतीय धर्म संसद में एक लाख से अधिक संत और राम भक्तों और पूज्य देवरहा बाबा की उपस्थिति में श्री राम जन्मभूमिपर मंदिर के शिलान्यास की घोषणा की गई। इस शिलान्यास की हुंकार सारे देश में पहुँचाने के लिए देशभर में, हर गाँव में ‘रामशिला पूजन कार्यक्रम’ बड़ी संख्या में आयोजित करने की योजना बनाई गई।करीब २ लाख ७५ हजार गाँवों में ‘रामशिला पूजन कार्यक्रम’ हुए। फिर, राम मंदिर निर्माण के लिए शिला (ईटे) भेजी गई। ९ नवंबर १९८९ को प्रातः पूज्य महंत अवैद्यनाथ, पूज्य वामदेव जी और महासंत रामचंद्रदास परमहंस के नेतृत्व में अयोध्या में नीव खोदी गई। बिहार के एक दलित बंधु, रामभक्त कामेश्वर चौपाल के हाथों पहली शिला रची गई। शिलान्यास से पहले उत्तर प्रदेश की काँग्रेस सरकार ने घोषणा की कि, शिलान्यास जिस स्थानपर हो रहा है वह स्थल विवादित नहीं है। लेकिन, ११ नवंबर को जब सात हजार से अधिक संत और रामभक्त मंदिर निर्माण के लिए निकले तब जिलाधिकारी के आदेशानुसार उन्हें रोका गया।

ही बातमी पण वाचा : मंदिर वही बनाएंगे… राम मंदिर का संघर्ष – १ : प्रकट…

राम मंदिर का निर्माण होने दिया तो मुसलमान नाराज होंगे ऐसा काँग्रेस की केंद्र और राज्य में की सरकारे मान रही थीं। उनके लिए मुस्लिमों का तुष्टिकरण महत्त्व रखता था। दूसरी तरफ, किसी भी स्थिति में राम मंदिर बनना ही चहिये यह तीव्र भावना हिन्दुओं में जागृत हुई थी। नवंबर १९८९ में हुए लोकसभा और विधानसभा के चुनाव में काँग्रेस केंद्र और उत्तर प्रदेश में बुरी तरह से पिटी। विश्वनाथ प्रतापसिंह (Vishwanath Pratapsingh) प्रधानमंत्री बने। वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रह चुके थें। ‘श्री राम जन्मभूमी मुक्ती यज्ञ समिती’ के प्रतिनिधियों ने उनसे मिलकर, राम जन्मभूमि के सारे ऐतिहासिक और पुरातत्व के सबूत उनके सामने प्रस्तुत किये। प्रधानमंत्री ने शिष्टमंडल को योग्य करवाई का आश्वासन दिया। फरवरी में हुई भेट में व्ही. पी. सिंग ने निर्णय के लिए समिति से चार माह की अवधि माँगी। वह अवधि जून में समाप्त हुई।

कालावधि समाप्त होने के बाद भी सरकार ने कोई प्रतिसाद नहीं दिया। १० अगस्त १९९० को वृंदावन में संतो की बैठक हुई; उसमे राम मंदिर के निर्माण में बाधा बननेवाले आव्हानों का सामना करने के लिए तन – मन – धन की आहुति देने का संकल्प किया गया। उसी माह देशभर में ‘श्री राम सेवा कारसेवा समितियाँ’ स्थापित की गई। १५ अगस्त को घंटानाद और शंखनाद कर ‘इशारा दिन’ मनाया गया। संतो ने ज्योतिपीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती की अध्यक्षता में ‘ श्री राम कारसेवा समिति’ की स्थापना की। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए ३० आॅक्टोबर १९९०, देवोत्थान एकादशी से कारसेवा आरंभ की जाएगी, ऐसी घोषणा कारसेवा समितिने की। विश्व हिंदू परिषद के महामंत्री अशोक सिंघल को समिति का संयोजक नियुक्त किया गया। मंदिर निर्माण का संकल्प घर-घर पहुँचाने के लिए ‘रामज्योति’ का आयोजन किया गया। १ सितंबर १९९० को अयोध्या में विधिवत मंत्रोच्चार में अग्नि प्रज्वलित किया गया और दीपावली में इसी अग्नि से हर घर में दीप प्रज्वलित किये जाए, ऐसा आवाहन संत – महन्तों ने किया। वहाँ प्रज्वलित ज्योति ४०० बड़ी और सैंकड़ो छोटी यात्राओं द्वारा देशभर में पहुंचाई गई। वह केवल ज्योति नहीं थीं, वह श्री राम मंदिर निर्माण का संकल्प था।

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