पुलिस अधिकारी ने रचा ‘संविधान काव्य’

नई दिल्ली : अगर आपको भारत का संविधान दोहे के रूप में मिल जाए तो क्या आप इसे पढ़ेंगे. पुड्डुचेरी के पुलिस प्रमुख एस के गौतम ने यही कोशिश की है.

कम ही लोग हैं जो इसे पढ़ने या जानने की कोशिश करते हैं. इसकी एक वजह ये भी है कि लंबे चौड़े संविधान की भाषा कठिन है.

आईपीएस अधिकारी एस.के. गौतम ने लोगों को इसी मुश्किल से निजात दिलाने की सोची और सामने आया उनका ‘संविधान काव्य’.

उन्होंने कहा, “असल में संविधान हमारे देश की नीतियों का मार्गदर्शक है. इसलिए हमारे देश का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ भी है. लेकिन आम आदमी इसे नहीं समझ पाता क्योंकि इसकी भाषा थोड़ी जटिल है. इसलिए मैंने यही सोचा कि संविधान को कैसे सरल भाषा में लिखा जा सकता है. मैंने यही कोशिश की और इसे पदों में रच दिया. इस तरह से यह आसान हो गया.”

गौतम को लंबे समय की पुलिस की नौकरी में महसूस हुआ कि ज़्यादातर लोग संविधान में वास्तव में क्या लिखा है उससे अनजान हैं. आमतौर पर लोगों को अदालतों और पुलिस की कार्रवाई के वक्त ही इसकी याद आती है.

उन्होंने संविधान को जन-जन तक पहुंचने के लिए आसान भाषा में सरल तरीके से पेश करने की सोची और सबसे पहले इसे दोहों की शक्ल में ढाल दिया. 12 अनुसूची और 448 अनुच्छेदों वाला भारतीय संविधान 25 भागों में बंटा है लेकिन एस के गौतम ने इसे संविधान काव्य के 394 दोहो में पूरा कर दिया है.

वो कहते हैं, ” मैंने कोशिश की है कि हर अनुच्छेद को दो लाइनों में उसके अर्थ के साथ समाहित कर दिया जाए और उसके नीचे मैंने उस अनुच्छेद का नंबर भी लिख दिया है ताकि उससे उसको जोड़ा जा सके.”

एक बार दोहे तैयार हो गए तो इसे किताब की शक्ल देना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं था. सरल भाषा और एनिमेशन ने इसे ऐसा बना दिया है कि बच्चों की भी इसमें दिलचस्पी जगे.

कुल 77 पन्नों की किताब में आप संविधान को जानने के साथ ही उसे याद भी कर सकते हैं. अगर भूल जाएं तो जेब से निकाल कर दोबारा पढ़ लीजिए, किताब पॉकेटबुक रूप में भी है.

गौतम कहते हैं, “जो भी अनुच्छेद हैं और उसके संशोधन हैं वो सब मिल कर काफी लंबे वाक्य बन जाते हैं, फिर उसके मूल भाव को समझाना कठिन था. ये दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है. लेकिन एक बार काम शुरू हो गया तो फिर मुझमें रुचि भी जगी और मज़ा भी आया.”

एस.के. गौतम मानते हैं कि लोग अगर संविधान को जान गए तो उसका उपयोग करना भी सीख जाएंगे. ख़ासतौर से पुलिस के मामले में ये बात और ज़्यादा मायने रखती है क्योंकि आए दिन ऐसी ख़बरें सामने आती हैं जब पुलिस खुद ही संविधान में दिए अधिकारों का दुरुपयोग करती है.