एक धक्का और दो… : मंदिर वही बनाएंगे – ४

Babri Majsid

नंदीग्राम में भरत ने १४ वर्ष वनवासी स्वरूप रहकर, प्रभु राम की पादुका सिंहासन पर रखकर अयोध्या का राज चलाया था। उसी स्थान पर यज्ञ समिति ने २६ सितंबर १९९२ को प्रभु राम की पादुकाओं का पूजन किया। ॲाक्टोबर में, हर गॉव में उन पादुकाओं के पूजन का समारोह आयोजित किया गया। राम भक्तों ने फिर एक बार मंदिर निर्माण का संकल्प दोहराया। २९ – ३० ॲाक्टोबर १९९२ को नई दिल्ली में पाँचवी धर्म संसद हुई। उसमें संतो ने केन्द्र सरकार के रवैये के बारे में तीव्र नाराजी व्यक्त कर ६ दिसंबर १९९२ से पुनः अयोध्या में कार सेवा आरंभ करने की घोषणा की।

सरकार हल खोजने में विफल हुई। इस कारण धर्म संसद ६ दिसंबर से कार सेवा करने पर दृढ़ रही। ६ दिसंबर से कुछ पहले ही कार सेवक अयोध्या पहुँच रहे थें। न्यायालय का एक आदेश ध्यान में रखकर कार सेवकों को परिचय-पत्र दिए जा रहे थें। दरम्यान, सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को शपथपत्र प्रस्तुत करने को कहा। राज्य में सत्ता परिवर्तन होकर भाजपा के कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने थें। उनकी सरकार ने शपथ पत्र दाखिल कर किया। उसमेँ लिखा था – २. ७७ एकड विवादित स्थल पर कोई भी निर्माण काम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। निर्माण साहित्य या यंत्र सामग्री इस आहाते में नहीं लाने दी जाएगी। सर्वोच्च न्यायालय ने सांकेतिक कारसेवा की अनुमति दी। न्यायालय ने एक निरीक्षक की नियुक्ति की। उसे सारे घटनाक्रम पर नज़र रखने को कहा। उत्तर प्रदेश सरकार के शपथपत्र का भंग नहीं होना चाहिए यह देखने के लिए इस निरीक्षक की नियुक्ति की गई थी।

यज्ञ समिति सोच रही थी की, लखनऊ उच्च न्यायालय के खंडपीठ में प्रलंबित २. ७७ विवादित जमीन की याचिका पर गीता जयंती, मतलब ६ दिसंबर से पहले फैसला आ जाएगा। इस कारण समिति ने कार सेवा के लिए ६ दिसंबर तारीख निश्चित की थी। ३ दिसंबर की सुनवाई में न्यायालय ने अगली सुनवाई के लिए ११ दिसंबर तारीख दी। यह जगह श्री राम जन्म भूमि न्यास की मालकियत थी। पहले की मुलायम सिंग की सरकार ने सरकार ने इसका अधिग्रहण किया था। यह अधिग्रहण अवैध है जमीन न्यास को लौटाई जाय, ऐसी माँग न्यास ने न्यायालय में की थी। ११ दिसंबर को न्यायालय ने, उत्तर प्रदेश ने किया जमीन का अधिग्रहण अवैध घोषित किया। लेकिन तब तक शरयू से बहुत पानी बह चुका था। इससे पाँच दिन पहले ही इतिहास रचा जा चुका था।

६ दिसंबर से पहले ही अयोध्या में चार लाख कार सेवक पहुँच चुके थें. इतनी बडी संख्या में उपस्थित कार सवकों को कैसे समझाए ऐसा प्रश्न यज्ञ समिति के समक्ष था। कही भी गडबड न करें, कानून हाथ में न लें, साधु-संतो के आदेश का पालन करें ऐसी सूचनाऐं बार-बार दी जा रही थीं। राम भक्त, नियोजित मंदिर निर्माण स्थल पर शरयू से एक मुट्ठी रेत लाकर डाले और प्रतिकात्मक कार सेवा करें, ऐसा आवाहन किया जा रहा था।

गीता जयंती के दिन, ६ दिसंबर को प्रातः लाखों रामभक्तों ने शरयू नदी में स्नान किया। रामकथा कुंज में इकट्ठा होने लगे। सुबह १० बजे कर्यक्रम शुरू हुआ। संत और आंदोलन के नेताओं का मार्गदर्शन आरंभ हुआ। उसी समय कुछ कार सेवक राम जान भूमि के समीप की अधिग्रहित की गई जगह की दिशा में जाने लगे। कार सेवक तुरंत उस स्थान से निकल जाय, वह स्थान खाली करें, ऐसी बिनती की जा रही, सूचना दी जा रही थी।

ध्वनिक्षेपक से बताया गया की जो कारसेवक हट नहीं रहें हैं उन्हें स्वयंसेवक उठाकर बाहर ले जाय। लेकिन, कारसेवक किसीकी बात मानने की मनःस्थिति में नहीं थें। उन्हें वहाँ से हटाने की कोशिश होते ही उनका संयम टूट गया। वे बॅरिकेडिंग लांघकर आगे बढ़ने लगे। फिर अन्य कारसेवकों को भी जोश आया, वे भी ‘जय श्री राम’ के नारे लगाते हुए बड़ी संख्या में आगे बढ़ने लगे। कुछ विवादित स्थल के करीब पहुँच गये। मंच पर उपस्थित नेता बार-बार सूचना देकर कार सेवकों को रोकने का प्रयास कर रहें थें। ऐसा ध्यान में आया कि विवादित स्थल की और बढ़ रहे बहुसंख्य कार सेवक दक्षिण भारतीय हैं इसलिए; रा. स्व. संघ के सरकार्यवाह हो. वे. शेषाद्री कन्नड, तमिल, तेलगू और मल्यालम में कार सेवकों को लौट आने का आवाहन करने लगे।

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी, भाजपा की वरिष्ठ नेता उमा भारती भी कार सेवकों से लौट आने का आवाहन कर रही थीं। कार सेवक उनकी बात नहीं मान रहें यह देखकर कुछ नेता मंच से नीचे उतरकर विवादित स्थल की और गये और कार सेवकों को लौटने के लिए मनाने लगे। उन नेताओं में अशोक सिंघल और लालकृष्ण अडवाणी भी थें। कुछ कार सेवक वापस लौटे भी लेकिन इसी बीच बड़ी संख्या में कार सेवकों के जत्थे विवादित स्थल के पास जमा हो गए थें। जैसे- जैसे जत्थे आते गए भीड़ अनियंत्रित होने लगी। आंदोलन के नेता ही नहीं, सुरक्षा बल भी असहाय हो गए। कार सेवकों के पास औजार नहीं थें। कुछ युवकों ने बॅरिकेडिंग के पाईप तोड़ें। पाईप के उन टुकड़ों से ढाँचा तोडना शुरू किया। दोपहर १. ३० बजे दीवार गिर गई। इसके बाद कार सेवकों का जोश बढ़ा।

कारसेवक ढाँचे पर चढ़ गए। दोपहर २. ४५ को पहला गुंबद गिरा। सायंकाल ४. ३० को दूसरा गुंबद गिरा। कुछ कार सेवक उसके नीचे दब गए। लेकिन कार सेवकों का उत्साह कम नहीं हुआ। धूल के बादल उड़ रहे थें। कारसेवकों ने तीसरा गुंबद भी गिरा दिया। जमीन समतल की। ६ दिसंबर की पूरी रात और ७ दिसंबर को भी काम चलता रहा। एक चबूतरा बनाया गया और पूजा शुरू कर दी गई। ८ दिसंबर को केन्द्र सरकार के आदेशानुसार सुरक्षा दल के जवान आये। उन्होंने सब नियंत्रण में लिया।

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