महाराष्ट्र: राष्ट्रवादी और शिवसेना गिनती नहीं… काँग्रेस का कोई वाली नहीं !

NCP-Congress

महाराष्ट्र के तीन दलों की महाविकास आघाडी सरकार में काँग्रेस की स्थिति दयनीय है। पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष तथा राजस्व मंत्री बाळासाहब थोरात और भूतपूर्व प्रदेशाध्यक्ष तथा सार्वजनिक निर्माण मंत्री अशोक चव्हाण के बीच चल रहा संघर्ष किसी से छिपा नहीं है।

दोनों एक – दूसरे को धोबीपछाड देने का मौका नहीं चूकतें। तीन दलों की समन्वय समिति में थोरात हैं लेकिन चव्हाण नहीं। अखिल भारतीय काँग्रेस के महाराष्ट्र प्रभारी मल्लिकार्जुन खर्गे को महाराष्ट्र काँग्रेस से कोई लेना- देना नहीं। ऐसा बोला जाता है कि पार्टी के मंत्री उनकी ‘सेवा’ कैसे करते हैं बस यह उनके लिए महत्त्व रखता है। काँग्रेस के मंत्री भी खर्गे को ‘खुश’ रखने की जुगत में लगे रहते हैं। कैसे, यह न पूछे। नागपुर में काँग्रेस के एक बड़े नेता थे, रिखबचंद शर्मा, काकाजी नाम से जाने जाते थें। उनको किसी प्रश्न पर ज्यादा छेडा जाता तो कहते थे, ‘डिटेल में मत जा’। खर्गेजी के बारे में भी वैसेही, उनकी सेवा कैसे की जाती है इसका उत्तर – ‘डिटेल में मत जाओ’ ही हैं।

राष्ट्रवादी के सब मंत्री उनके विधायकों को बुलाकर पूछते हैं कि, उनके क्षेत्र के क्या काम करने हैं, कितना पैसा लगेगा; और उस पैसों की व्यवस्था भी करते हैं। राष्ट्रवादी के विधायकों को ज्यादा से ज्यादा राशि मिले इसपर उपमुख्यमंत्री एवं वित्तमंत्री अजित पवार स्वयं ध्यान रखते हैं। ग्रामविकास मंत्री हसन मुश्रीफ ने राष्ट्रवादी के हर विधायक के चार – पाँच करोड़ के काम मंजूर किए हैं ऐसी चर्चा हैं। लेकिन काँग्रेस में ऐसा नहीं है। काँग्रेस के मंत्री पार्टी के विधायकों के काम करते समय भी यह देखते हैं की वह उनके गुट का है या नहीं! इस शिकायत की काँग्रेस में खुली चर्चा चलती हैं।

हालही में अजित पवार ने बजट प्रस्तुत किया। इसमें राष्ट्रवादी के मंत्रियों के विभागों का कैसे विशेष ध्यान रखा गया है यह आँकड़ों से स्पष्ट होता है। राष्ट्रवादी में जो अजितदादा के खास हैं उनपर बजट में विशेष कृपा की गई हैं, ऐसी चर्चा है। अजितदादा फिर पार्टी पर पकड़ जमा रहे हैं।शिवसेना के नेता, सांसद, विधायक और मंत्रियों के काम रुकने नहीं चाहिए इसपर शिवसेना के प्रमुख और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे स्वयं ध्यान रखते हैं। राष्ट्रवादी में शरद पवार और उनके बाद अजित पवार – ऐसे दो बड़े नेता अपनी पार्टी के मंत्रियों – विधायकों के काम रुकने नहीं चाहिए इसपर नज़र रखे रहतें हैं। महाराष्ट्र में काँग्रेस के पास ऐसा कोई नेता है ही नहीं ! सब स्वयं केन्द्रीत हैं। बहुत हुआ तो अपने गुट के विधायकों की कुछ सहायता करेंगे लेकिन पार्टी के बारे में व्यापक विचार करने की क्षमता किसी में नहीं। काँग्रेस के विधायक खुले आम इस बात का दुखड़ा रोते हैं। इसे सीधे ज्योतिरादित्य सिंधिया से जोड़ना तो उचित नहीं होगा लेकिन, काँग्रेस में निरंतर उपेक्षा होने की टीस में ही ज्योतिरादित्य भाजपा में गए, इस सच्चाई को नकारा भी नहीं जा सकता।

पार्टी में हमारी सुध लेनेवाला कोई नहीं है, ऐसी आज काँग्रेस के अनेक विधायकों की भावना हैं।इसका मतलब यह नहीं कि वे भी तुरंत ज्योतिरादित्य सिंधिया का रास्ता अपनाएंगे। काँग्रेस के नेता स्वयं से हटकर सोचते ही नहीं, यह पार्टी के विधायकों की टीस जितनी जल्दी मिटाई जाएगी उतना काँग्रेस के लिए लाभप्रद होगा। अन्यथा, राष्ट्रवादी दबाव में रखती हैं और शिवसेना सुध नहीं लेती यह भावना राज्य में काँग्रेस को और अकेला कर देगी।

सरकार में किसी भी काम के लिए दो ही लोगों के पास जाना पड़ता हैं; एक मुख्यमंत्री और दूसरा वित्त मंत्री। इसमें से कोई भी पद काँग्रेस के पास नहीं हैं। इस कारण अपने मतदार संघ के कामों की मंजूरी और राशि के लिए काँग्रेस के मंत्रियों को पाँच वर्ष मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और वित्त मंत्री अजित पवार पर ही निर्भर रहना होगा। काँग्रेस के मंत्रियों – विधायकों के काम करने के लिए बाळासाहब थोरात और अशोक चव्हाण ने आक्रमक होना अपेक्षित हैं। काँग्रेस के मंत्री नितिन राऊत, विजय वडेट्टीवार आक्रमक है लेकिन उद्धव ठाकरे और अजित पवार के सामने उनकी कुछ नहीं चलेगी. सुनील केदार किसी से भी भीड़ सकते हैं लेकिन उन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता. वर्षा गायकवाड़ अपने विभाग से परे कुछ देखना नहीं चाहती. अपने विभाग से हटकर ज्यादा हाथ – पाँव फ़ैलाने की कोशीश की तो पंख छांट दिए जाएंगे, ऐसा डर वडेट्टीवार, वर्षा गायकवाड को लगता हैं। नितिन राऊत निर्भिडता से अपनी बात रखते हैं लेकिन उनकी बात पिछड़े वर्ग से संबंधित विषयों तक ही सीमित होती हैं। इस स्थिति में काँग्रेस की बात कौन करेगा ?

महाविकास आघाडी में काँग्रेस की कोई हैसियत नहीं यह गत सप्ताह फिर सिद्ध हुआ। काँग्रेस चाहती थी कि राज्य में राज्यसभा की दूसरी सीट उसे मिले। इसके लिए काँग्रेस के नेताओं ने हाथ – पाँव भी मारे लेकिन किसीने उनको भाव नहीं दिया। वह सीट राष्ट्रवादी के फौजिया खान के खाते में गई। काँग्रेस के नेता इसके लिए आवश्यक दबाव नहीं बना पाए। उद्धव ठाकरे और शरद पवार ने काँग्रेस के नेताओं को ठेंगा दिखाया।