दिल्ली कब जागेगी ??

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दिल्ली ने राधाकृष्ण विखे पाटील को विधानसभा का विपक्ष का नेता बनाकर भाजपा को वरदान दिया है। सब अच्छे वक्ता आक्रमक वृत्ति के होते है, ऐसा नहीं। लेकिन, विपक्ष के नेता होते हुए भी किसी भी मुद्दे पर ठोस भूमिका नहीं लेना यह विखे की सबसे बड़ी असफलता है, ऐसा राजनीति के विश्लेषक मानते हैं।

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सभागृह में विखे का सामना मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ होता है। मुख्यमंत्री विरुद्ध विपक्ष नेता के बीच की शब्दों की लड़ाई विधानसभा ने कई बार देखी है। ढृढ़ता और आत्मविश्वास से बोलने में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस राधाकृष्ण विखे पाटील से कही आगे है। विखे के सामने केवल यही आव्हान नहीं है; विपक्ष की ओर से भी उनके सामने बड़ी चुनौती है। अजित पवार, जयंत पाटील, दिलीप वळसे पाटील, छगन भुजबळ जैसे एक से बढ़कर एक धुरंधर राष्ट्रवादी काँग्रेस का गढ़ लढ़ाते हैं। दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना चालाकी से सत्ता का उपभोग लेने के साथ – साथ भाजपा के विरोध में विपक्ष के लिए कोई मुद्दा शेष नहीं रहने देती! इस कारण विधानसभा में काँग्रेस प्रभावहीन विपक्ष बनकर रह गया है।

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पिछले अधिवेशन में विपक्ष का काम बहुत ही सामान्य स्तर का रहा। पहले ४ दिन विपक्ष ने सभागृह का कामकाज क्यों चलने नहीं दिया, यह समझ नहीं आता। ८ दिनों के अधिवेशन में ४ दिन काम रोककर विपक्ष ने क्या हासिल किया ? मराठा आरक्षण के बारे में प्राप्त राज्य पिछड़ा आयोग का रिपोर्ट सरकार सभागृह में प्रस्तुत करनेवाली थी ही नहीं। फिर सरकार यह रिपोर्ट प्रस्तुत करें, ऐसा आग्रह कर विपक्ष ने क्या हासिल किया ? विपक्ष को आरक्षण चाहिए या रिपोर्ट ? रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं करेंगे तो सभागृह का काम नहीं चलने देंगे इस बात पर अड़े विपक्ष ने ४ दिन हंगामा कर सभागृह का काम नहीं होने दिया और सरकार ने रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की फिर भी ५ वे दिन विपक्ष चुपचाप सभागृह के काम में शामिल हुआ ! इसका अर्थ स्पष्ट है की विपक्ष को केवल हंगामा मचाना था।इस स्थिति में क्या ये कहा जा सकता है की आरक्षण के रिपोर्ट के मुद्दे पर विपक्ष ने सरकार की नाकाबंदी की ? रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं करने की भूमिका पर सरकार दृढ़ रही; अंत तक रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की और सीधे विधेयक ही प्रस्तुत किया। यह स्पष्ट सरकार की जीत और विपक्ष की हार है। वास्तविकता तो यह है कि इस अधिवेशन में एक भी बार विपक्ष सरकार को मुश्किल में नहीं जकड़ सका।

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राष्ट्रवादी तो पुराना हिसाब ही चुकाने में लगी है। भाजपा जब विपक्ष में थी तब भाजपा के कुछ नेता सभागृह में कुछ राष्ट्रवादी के विशिष्ट मंत्रियों का बचाव करते थे। अवनि बाघिन मारने के संवेदनशील मामले में जयंत पाटिल ने चुलबुला भाषण देकर वन मंत्री मुनगंटीवार को ‘सेफ पॅसेज’ दिया, यह आश्चर्य है !

मंत्रालय में तो दबी जुबान में चर्चा है की ऊर्जा मंत्री चंद्रशेखर बावनकुळे भले ही भाजपा के विधायक – मंत्रियों के काम नहीं करेंगे लेकिन अजितदादा ने छोटी चिठ्ठी दी या फोन भी किया तो भी काम गारंटी से होता है। मुख्यमंत्री ने तो विधनसभा में अजितदादा की और देखते हुए सीधे कहा की – ‘बावनकुळे मेरे से ज्यादा आपकी बात मानते हैं।’ बावनकुळेजी! समझनेवालों को इशारा काफी है|

विधानसभा और लोकसभा के चुनाव कुछ ही महिनों में होने हैं, लेकिन महाराष्ट्र में काँग्रेस के कार्यकर्ता अभी भी काँग्रेस के नेताओं के लड़ने की मानसिकता के बारे में संदेह में हैं। काँग्रेस की जनसंघर्ष यात्रा को मिला मर्यादित प्रतिसाद यह बात सिद्ध करता है। दिल्ली के निर्णय के कारण काँग्रेस के सामान्य कार्यकर्ता के लिए – ‘विखे फिर एक बार फीके’ कहने की नौबत आ सकती है ….