काँग्रेसने प्रदर्शित किया संविधान का अज्ञान

Congress

विरोध को ताक पर रखकर मोदी सरकार ने कृषि क्षेत्र से संबंधित तीन नए कानून बनाने से काँग्रेस हडबडा गई है।संसद में काँग्रेस (Congress) की संख्या देखते हुए इसे कानून बनाने से रोकना काँग्रेस के लिए असंभव था। इस कारण उसने अन्य विरोधी दलों के साथ मिलकर ससंद परिसर में इसका विरोध करने के लिए धरना दिया। फिर राष्ट्रपति से मिलकर इस कानून को संमति न देने की बिनती की। इसके दूसरे ही दिन राष्ट्रपति ने इस कानून को संमति दी। केरल से निर्वाचित काँग्रेस के लोकसभा के एक सांसद ने इन तीन में से एक कानून को आव्हान देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की। विपक्ष के नाते, जनतंत्र में काँग्रेस ने ऐसा कुछ करने में अनुचित कुछ भी नहीं। लेकिन सोमवार को काँग्रेस ने इस संदर्भ में उठाया कदम चिंता निर्माण करनेवाला है। कारण, आझादी के ७० वर्ष बाद करीब ५० वर्ष इस देश पर शासन करनेवाली काँग्रेस का इसमें अज्ञान ही प्रकट होता है। काँग्रेस के साथ पी. चिदम्बरम, कपिल सिब्बल और सलमान खुर्शीद जैसे कानून के विख्यात पंडित होते हुए भी काँग्रेस ने ऐसा करना हास्यास्पद है। काँग्रेस सचिव के. सी. वेणुगोपाल ने सोमवार को माध्यमों के लिए पत्रक प्रकाशित कर पार्टी और साथ ही पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) का संविधान के बारे में का अज्ञान प्रदर्शित किया।

पत्रक में कहा गया है कि, केंद्र सरकार ने कृषि के बारे में बनाए नए कानून राज्यों के अधिकारों का अधिक्षेप करनेवाले और किसानों के हितों का अहित करनेवाले हैं इसलिए उन्हें निष्प्रभ करने के लिए काँग्रेस शासित राज्यों की सरकारें अपने अधिकार में आवश्यक कानून बनाए, ऐसी सलाह पार्टी के अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दी। इसके लिए उन्होंने संविधान की धारा २५४ (२) का संदर्भ दिया हैं। दावा किया गया है कि यह धारा राज्यों को यह अधिकार देती हैं। ऐसा करने के बाद कृषि उत्पादनों को समर्थन मूल्य पर खरीदने और कृषि मंडियों की प्रस्थापित व्यवस्था को कमजोर करने की मोदी सरकार के कानूनों की चुंगुल से राज्य सरकारे अपना पीछा छुड़ा सकेंगी, ऐसा काँग्रेस कहती हैं।

संविधान का अनुच्छेद २५४ (२) निश्चित क्या है यह देखने से पता चलता हैं की काँग्रेस ने इस अनुच्छेद का आधार लेना कैसे हास्यास्पद है। इसको लेकर काँग्रेस कितनी भी उछलें उसका हेतु साध्य नहीं होगा। केन्द्र की संसद और राज्यों के विधिमंडल किन विषयों पर कानून बना सकते हैं इसकी तीन सूचियाँ संविधान के परिशिष्ट में दी हैं। इसमें की पहली सूची केवल संसद के अधीन विसयों की, दूसरी केवल विधिमण्डलों के अधीन विषयों की और तिसरी संसद और राज्य विधिमण्डल दोनों के अधीन सामयिक विषयों की हैं। सामयिक विषयो में के एक ही विषय पर यदि संसद और विधिमंडल दोनों भी कानून बनाते हैं तो कोनसा कानून प्रभावी माना जाए इसका खुलासा करनेवाले अनुच्छेद भी संविधान में हैं। अनुछेद २५४ (२) उनमें से ही एक हैं। इस अनुच्छेद के अनुसार – राज्य ने बनाए कानून के प्रावधान संसद ने बनाए और पहले से लागू सामयिक सूची के विषयों से संबंधित प्रावधानों से विपरीत हो, लेकिन राज्य के उस कानून को राष्टपति की मंजूरी मिली हो तो राज्य का वह कानून केंद्रीय कानून से विसंगत होते के बाद भी लागू रहेगा। लेकिन, राज्य द्वारा निर्मित ऐसे किसी भी कानून को बदलने या वह पूरी तरह रद्द हो ऐसा कोई भी नया कानून कभी भी बनाने का अधिकार संसद को हैं।

आज जारी कृषि विषयक कानून के विवाद से संबंधित ‘कृषि’ यह विषय सामयिक सूची का हैं। इसके अंतर्गत महाराष्ट्र के साथ अनेक राज्यों ने कृषि मंडियों या समर्थन मूल्य पर कृषि उत्पादन खरीदने से संबंधी कानून पहले से बनाए हैं। उस समय, इस विषय से संबंधित संसद द्वारा निर्मित कोई कानून नहीं था। अगर होता भी तो राज्यों के उन कानूनों को राष्ट्रपति की अनुमति मिली होने के कारण वह पहले के समान ही प्रभावी रहतें। संसद ने अभी बनाए तीन कृषि कानून अनुच्छेद २५४ (२) के अंतिम भाग में दिए अधिकारों का प्रयोग कर बनाए हैं। यह अनुच्छेद राज्यों द्वारा निर्मित और पहले से अस्तित्व में रहे केंद्रीय कानूनों से विसंगत किसी भी कानून को निष्प्रभ करने का अधिकार केंद्र को देता हैं। मोदी सरकार ने बनाए नए कानून से, राज्यों द्वारा निर्मित ऐसे कानून में के इस कानून से विपरीत प्रावधान अप्रत्यक्ष प्रभाव से निष्प्रभ होंगे। संसद ने इस प्रकार निष्प्रभ किया राज्य का कोई भी कानून फिर बनाने का अधिकार संविधान ने कही भी राज्यों को नहीं दिया हैं। अनुच्छेद २५४(२) में तो निश्चित ही नहीं !

महाराष्ट्र (Maharashtra) में कई बार आज की स्थिति से विपरीत स्थिति निर्माण हुई हैं। केंद्र ने सूचना, रोजगार गारंटी और पंचायत राज व्यवस्था से संबंधित कानून बनाए। महाराष्ट्र राज्य विधिमंडल ने इस संबंध में बनाए कानून उससे पहले ही अस्तित्व में थें। इस विषय पर संसद ने कानून बनाने के बाद, इसी विषय पर पहले राज्य ने बनाए कानून पूर्णतः निष्प्रभ हुए या उनमें के केंद्र के कानूनों के विपरीत के प्रावधान, केंद्र के कानून के अनुसार लागू हुए।

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