चंद्रयान – 2 : ऑर्बिटर अब भी लगा रहा है चंद्रमा का चक्कर, नाकामी 5 प्रतिशत

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चंद्रमा की सतह से केवल 2.1 किलोमीटर ऊपर विक्रम लँडर का इस्रो से संपर्क टूट गया। लेकिन इससे यह अभियान असफल नहीं हुआ। यह इस अभियान का 5 प्रतिशत हिस्सा है। ऑर्बिटर सफलतापूर्वक चाँद के चक्कर लगा रहा है। यह अभियान की 95 प्रतिशत सफलता है।


बंगलुरु : चंद्रमा की सतह से केवल 2.1 किलोमीटर ऊपर विक्रम लँडर का इस्रो से संपर्क टूट गया। लेकिन इससे यह अभियान असफल नहीं हुआ। यह इस अभियान का 5 प्रतिशत हिस्सा है। ऑर्बिटर सफलतापूर्वक चाँद के चक्कर लगा रहा है। यह अभियान की 95 प्रतिशत सफलता है।

पूरी तरह स्वदेशी चंद्रयान-2 का लँडर (विक्रम) शुक्रवार-शनिवार की दरमियानी रात 1:53 बजे चांद पर उतरने वाला था। रात करीब ढाई बजे इस्रो अध्यक्ष के सिवन ने बताया कि ‘यान का संपर्क टूट गया है। 978 करोड़ रुपये की लागत वाले इस मिशन का सबकुछ खत्म नहीं हुआ है। एक अधिकारी ने बताया कि मिशन का केवल पाँच प्रतिशत ( लँडर विक्रम और प्रज्ञान रोवर) नुकसान हुआ है। 95 प्रतिशत ऑर्बिटर सफलतापूर्वक चाँद के चक्कर काट रहा है।

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ऑर्बिटर की कार्यावधि एक वर्ष है। वह इस्रो को तस्वीरें भेजता रहेगा। ऑर्बिटर लँडर की तस्वीरें भी भेज सकता है। जिससे उसकी स्थिति के बारे में जानकारी मिल सकती है। चंद्रयान-2 के तीन हिस्से हैं – ऑर्बिटर (2,379 किलोग्राम, आठ पेलोड), विक्रम (1,471 किलोग्राम, चार पेलोड) और प्रज्ञान (27 किलोग्राम, दो पेलोड)। दो सितंबर को विक्रम ऑर्बिटर से अलग हो गया था। जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हिकल-मार्क 3 (जीएसएलवी एमके 3) के जरिए चंद्रयान-2 को 22 जुलाई को अंतरिक्ष में लॉन्च किया गया था।

चंद्रयान-2 मिशन को 2008 में मंजूरी मिली थी। इसके बाद सबसे बड़ी चुनौती लँडर और रोवर की टेस्टिंग थी। इसके लिए चंद्रमा जैसी मिट्टी, कम ग्रॅव्हिटी वाला क्षेत्र, चाँद पर पड़ने वाली चमकदार रोशनी और वातावरण की रचना करना था। एक रास्ता था अमेरिका से सिमुलेटेड लूनर सॉईल (चाँद की मिट्टी जैसी मिट्टी) लाना। इस मिटटी की कीमत प्रति किलो कीमत 10,752 रुपये है। 70 टन मिट्टी की जरूरत थी। इसकी लागत काफी अधिक थी इसलिए तय किया गया कि थोड़ी मिट्टी अमेरिका से खरीदी जाए और उसका अध्ययन करके ऐसी ही मिट्टी को ढूंढा जाए।

खोज के बाद पाया गया कि तमिलनाडु के सालेम में एनॉर्थोसाइट नाम की चट्टानें हैं जो चांद की चट्टानों से मिलती हैं। जिस मिट्टी को खरीदने के लिए हमें 72 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते, वह काम मुफ्त में हो गया। त्रिची के नॅशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, पेरियार यूनिवर्सिटी और बेंगलुरू के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सायन्स ने उन चट्टानों को पीसकर चंद्रमा की मिट्टी जैसी मिट्टी तैयार की। उस मिट्टी को इस्रो सैटेलाइट इंटीग्रेशन एंड टेस्टिंग एस्टेब्लिशमेंट बेंगलुरू लाया गया और दो मीटर मोटी सतह बनाई गई। यहाँ उतनी ही रोशनी रखी गई जितनी चाँद पर है। यहाँ 2015 से अब तक हजारों बार लँडिंग कराई गई। चाँद पर गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी से छह गुना कम है जिसके लिए हीलियम गैस का इस्तेमाल किया गया।