साईबाबा किस धर्म के थे? कहाँ के थे? किस कुल के थे?

shirdi sai baba

साईबाबा का जन्मस्थल कहे जानेवाले पाथरी का विकास करेंगे, ऐसी घोषणा कर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने अनजाने पुराने विवाद को हवा दी हैं । कहावत हैं  कि ‘ऋषि का कुल और नदी का मूल’ खोजना नहीं चाहिए। भक्तों ने कई बार पूछने के बाद भी साईबाबा ने जीवन में कभी भी उनके नाम, जाति और धर्म के बारे में नहीं बताया। शायद उन्हें पता होगा कि भविष्य में जाति और धर्म मानवता के लिए सबसे बड़ी बाधा बनेंगे। हिन्दू उन्हें ‘संत’ तो मुसलमान ‘पीर’ मानते थे। साईबाबा शिरडी में आए तब म्हाळसापति  ने उन्हें दिया नाम ही उन्होंने अपना लिया। धुले  के न्यायालय में कमिशन (आयोग) के मुद्दे पर गवाही देते समय साईबाबा ने पंथ या धर्म ‘कबीर’ (हिन्दू – मुस्लिम एकता के प्रतीक) और जाति ‘परवरदिगार’ (अल्लाह या ईश्वर) बताई थी। साईबाबा के जाति – धर्म का पता नहीं होने के कारण भक्तों के लिए बाबा सर्वधर्मसमभाव के प्रतीक हैं। दाभोळकर लिखित बाबा के मूल चरित्र में यही बताया गया है।

जन्मस्थल

संत दासगणु लिखित सेलू के केशवराज बाबासाहेब महाराज के चरित्र में उल्लेख है कि, साईबाबा का जन्म पाथरी में हुआ और बाबासाहेब उपाख्य गोपाळराव साईबाबा के गुरु हैं। इसी सूत्र का आधार लेकर १९७५ के दरम्यान विश्वास खेर ने साईबाबा का नाम हरिभाऊ भुसारी और उनका जन्म ब्राह्मण  परिवार में होने का तर्क दिया था। लेकिन बीच की दो पीढ़ियों की जानकारी नहीं मिलने के कारण वे भी साशंक थे। गोपाळराव महाराज का निर्वाण मंगलवार, १५ दिसम्बर १८०१ में साईबाबा के जन्म के पूर्व ही हुआ था। ऐसा भी बताया जाता है कि साईबाबा का जन्म तमिलनाडू  के श्रीवैकुंठम में हुआ था। उनके एक तमिल चरित्र में जानकारी  हैं  कि  लक्ष्मीबाई और साठेशास्त्री उनके माता -पिता थे। गुजराती साईसुधा बाबा का जन्म जाफा दरवाजा में ११ अगस्त १८५८ में गुजराती ब्राह्मण परिवार में हुआ।

जमनाबाई और नंदलाल उनके माता – पिता हैं। फिर वे पाथरी गये। मंगलवेढा में दिगंबर नाम के एक बाबा थे। वे ही साईबाबा हैं, ऐसी चर्चा थी। ‘साई शरणानंद चरित्र’ में कहा  हैं  कि, बाबा का जन्म पाथरी में हुआ। देवगिरि अम्मा और गंगाभाव उनके माता – पिता थे। ऐसा भी कहा जाता  हैं  कि ब्रिटिशों के विरुद्ध के १८५७ के विद्रोह के बाद भूमिगत हुए नानासाहेब पेशवा ही साईबाबा थे। साईबाबा, शिर्डी आनेवालों से पाथरी का हालचाल पूछते थे। इसका अर्थ यह तो  हैं  कि उन्हें पाथरी की जानकारी थी। लेकिन, केवल इससे ही यह कहना कि वे पाथरी के थे; जल्दबाजी होगी। ब्रिटिश भी इस बारे में  च्चाई नहीं जान पाए थे। बाबा के कोई रिश्तेदार कभी उनसे मिलने आए नहीं इसलिए, बाबा के जन्मस्थल और माता – पिता के बारे में के सब दावे केवल तर्क पर आधारित हैं। अनेक महात्मा – संत जाति का लेबल लगने के कारण समूह की मर्यादा में सिमटकर रह गए।

साईबाबा को भी तथाकथित जन्मस्थल के बहाने जाति – धर्म का लेबल लगाना मानवता के हित में नहीं है। साईबाबा ने स्वयं जिन विषयों पर कभी बात नहीं की उनपर भाष्य करना, साईबाबा पर अन्याय और उनके करोड़ों भक्तों की श्रद्धा को ठेस पहुँचाना होगा। पाथरी के साई मंदिर का विकास होता हैं तो ख़ुशी ही है। लेकिन, उनके तथाकथित जन्मस्थल की खोज में साईबाबा के सर्वधर्मसमभाव की पहेचान नहीं मिटनी चाहिए। पाथरी के विकास के लिए पैसे देने को कोई विरोध नहीं है। लेकिन उसे अब तक नहीं मिली, साईबाबा के जन्मस्थल की पहेचान चिपकाई नहीं जानी चाहिए।

साईबाबा की जन्मभूमी, उनके मात – पिता के संदर्भ में अनेक दावे हैं। इस आंदोलन के बहाने उनपर कोई ठोस निर्णय हो ऐसा शिर्डीवालों का प्रयास हैं। इसलिए ही अनिश्चितकालीन बंद आयोजित किया गया हैं। इस आंदोलन में अब इस क्षेत्र के एक दर्जन से ज्यादा गाँव भी शामिल हुए हैं। सर्वधर्मसमभाव यह साईबाबा की पहेचान हैं। साईबाबा ने जाति – धर्म की बात नहीं की। शिर्डीवालों को लगता है कि, इस तथाकथित जन्मस्थल के दावे के कारण साईबाबा के सर्वधर्मसमभाव की प्रतिमा को ठेस लगेगी.